राजा मोरध्वज की कथा
![]() |
राजा मोरध्वज की कथा |
अर्जुन के इसी गर्व को तोड़ने के लिए भगवान श्रीकृष्ण उन्हें अपने साथ एक अद्भुत परीक्षा का साक्षी बनाने ले गए।
साधुओं का वेश और परीक्षा की शुरुआत
श्रीकृष्ण और अर्जुन ने साधुओं (जोगियों) का वेश धारण किया। वन से एक शेर पकड़कर वे भगवान विष्णु के परम भक्त, महान दानी राजा मोरध्वज के द्वार पर पहुँचे।
राजा मोरध्वज अपनी दानशीलता और अतिथि-सत्कार के लिए प्रसिद्ध थे। उनके द्वार से कोई भी अतिथि बिना भोजन और सम्मान के नहीं लौटता था। जब उन्हें ज्ञात हुआ कि दो साधु सिंह के साथ द्वार पर आए हैं, तो वे नंगे पाँव दौड़कर बाहर आए और साधुओं के तेज से नतमस्तक होकर उन्हें आदरपूर्वक आतिथ्य स्वीकार करने का निवेदन किया।
भगवान की कठोर शर्त
भगवान श्रीकृष्ण ने राजा से कहा कि वे तभी आतिथ्य स्वीकार करेंगे, जब राजा उनकी एक शर्त मानें। राजा ने उत्साहपूर्वक कहा— "आप जो भी कहेंगे, मैं करने को तैयार हूँ।"
तब भगवान ने कहा—
"हम तो ब्राह्मण हैं, हमें कुछ भी खिला देना। लेकिन यह सिंह नरभक्षी है। यदि तुम अपने इकलौते पुत्र को अपने हाथों से मारकर इसे खिला सको, तभी हम तुम्हारा आतिथ्य स्वीकार करेंगे।"
यह सुनकर राजा मोरध्वज स्तब्ध रह गए। फिर भी उन्होंने अतिथि-धर्म नहीं छोड़ा और भगवान से अनुमति लेकर अपनी पत्नी से परामर्श करने महल चले गए।
रानी का त्याग और धर्म
राजा का उतरा हुआ मुख देखकर पतिव्रता रानी ने कारण पूछा। जब राजा ने सारी बात बताई तो रानी की आँखों से आँसू बह निकले, किंतु फिर भी वह दृढ़ स्वर में बोली—
"स्वामी, आपकी आन और धर्म के लिए मैं अपने सैकड़ों पुत्र भी बलिदान कर सकती हूँ। आप साधुओं को आदरपूर्वक भीतर ले आइए।"
अर्जुन का संशय
यह सब देखकर अर्जुन विचलित हो गए। उन्होंने श्रीकृष्ण से पूछा—
"माधव! यह क्या हो रहा है? आपने यह कैसी माँग रख दी?"
श्रीकृष्ण मुस्कराकर बोले—
"अर्जुन, तुम केवल देखते रहो और मौन रहो।"
पुत्र का बलिदान
राजा मोरध्वज अपने तीन वर्षीय पुत्र रतन कँवर को लेकर आए। वह भी अपने माता-पिता की तरह भक्त और आज्ञाकारी था। उसने बिना किसी भय और पीड़ा के हँसते-हँसते अपने प्राण त्याग दिए।
राजा और रानी ने अपने हाथों से पुत्र को सिंह को अर्पित किया। भगवान ने भोजन ग्रहण किया, किंतु जब रानी की दृष्टि पुत्र के अवशेषों पर पड़ी, तो वह आँसू रोक न सकी।
भगवान ने इसे अधूरा त्याग मानकर क्रोध प्रकट किया और वहाँ से जाने लगे। राजा-रानी ने उन्हें रोकने की बहुत विनती की।
अर्जुन का गर्व टूटना
अब अर्जुन समझ चुके थे कि यह सब उनके ही अहंकार को तोड़ने के लिए हो रहा है। वे श्रीकृष्ण के चरणों में गिर पड़े और विनती करने लगे—
"प्रभु! आपने मेरा झूठा गर्व तोड़ दिया। अब इस महान भक्त के साथ अन्याय न करें।"
चमत्कार और भगवान का दर्शन
तब श्रीकृष्ण ने रानी से अपने पुत्र को पुकारने को कहा। रानी ने भारी मन से पुत्र का नाम लिया।
क्षणभर में ही चमत्कार हुआ—
जिस रतन कँवर को सिंह खा चुका था, वही बालक हँसता हुआ जीवित सामने आ खड़ा हुआ और अपनी माँ से लिपट गया।
इसके बाद भगवान ने राजा मोरध्वज और रानी को अपने विराट स्वरूप के दर्शन कराए। पूरे राजमहल में "वासुदेव कृष्ण की जय" की गूँज होने लगी।
अंतिम वरदान
भगवान के दर्शन पाकर राजा मोरध्वज भाव-विभोर हो गए। भगवान ने वरदान माँगने को कहा।
राजा और रानी ने हाथ जोड़कर कहा—
"प्रभु! बस एक ही वरदान दें कि अपने भक्तों की ऐसी कठोर परीक्षा कभी न लें, जैसी आपने हमारी ली।"
भगवान ने "तथास्तु" कहकर उन्हें आशीर्वाद दिया और पूरे परिवार को मोक्ष प्रदान किया।
यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति अहंकार से नहीं, बल्कि पूर्ण समर्पण और त्याग से प्राप्त होती है।

0 टिप्पणियाँ
LEAVE YOUR COMMENT HERE