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| पंढ़रपुर के भक्त गोराजी कुम्हार की अद्भुत भक्ति कथा – पढ़ें कैसे उनकी भक्ति और प्रभु की लीला ने उनके जीवन को बदल दिया। |
भक्त गोराजी कुम्हार – भक्ति और चमत्कार
पंढ़रपुर में भगवान विट्ठलनाथजी के परम भक्त गोराजी कुम्हार अपनी पत्नी और दो वर्ष के पुत्र के साथ रहते थे। वे दिन-रात प्रभु विट्ठल का स्मरण करते हुए मिट्टी के बर्तन बनाया करते थे।
एक दिन उनकी पत्नी पानी भरने गई और बालक को गोराजी के पास छोड़ गई। उस समय पानी दूर-दूर से लाना पड़ता था। बालक को खेलते देख गोराजी ने सोचा कि कुछ काम कर लिया जाए। उन्होंने मिट्टी पर पानी छिड़का और पैरों से मिट्टी गूँथते हुए “विट्ठल-विट्ठल” का जप करने लगे।
भक्ति में लीन होते-होते उनकी आँखें बंद हो गईं और वे समाधि-सी अवस्था में पहुँच गए। उसी समय खेलता हुआ बालक उनके पास आ गया। दुर्भाग्यवश गोराजी का पैर बालक पर पड़ गया और वह मिट्टी में दब गया। बालक रोता रहा, पर गोराजी गहरी भक्ति में मग्न थे। बालक की मृत्यु हो गई।
जब पत्नी पानी लेकर लौटी और बालक को न पाया, तो खोजबीन शुरू हुई। अंत में मिट्टी में दबे बालक की हड्डियाँ दिखाई दीं। पत्नी विलाप करने लगी। गाँव वालों ने गोराजी को भला-बुरा कहा और उनकी भक्ति पर प्रश्न उठाए।
गोराजी ने शांत भाव से कहा—
“यह संसार स्वप्न है। प्रभु जो करते हैं, वही कल्याणकारी होता है।”
प्रभु की करुणा और चमत्कार
भगवान विट्ठलनाथ भक्त की पीड़ा देखकर योगी का रूप धारण कर उनके द्वार आए। पत्नी ने अतिथि धर्म निभाते हुए उन्हें भोजन का आग्रह किया। योगी ने कहा—
“पहले अपने पुत्र को बुलाओ।”
जब योगी ने बालक पर रखा वस्त्र हटाया, तो चमत्कार हुआ—मृत बालक जीवित हो उठा। यह प्रभु की लीला थी।
त्याग, व्रत और कठिन परीक्षा
गोराजी को यह जानकर पीड़ा हुई कि प्रभु को उनके कारण कष्ट उठाना पड़ा। उन्होंने पत्नी से दूरी बना ली और उसे माता समान मान लिया। आगे चलकर दूसरी पत्नी से विवाह हुआ, पर गोराजी ने संयम का पालन किया।
एक रात भ्रमवश हुए स्पर्श से व्यथित होकर उन्होंने अपने हाथ काट लिए। इससे परिवार की आर्थिक स्थिति डगमगा गई।
स्वयं भगवान बने सेवक
भगवान विट्ठलनाथ स्वयं कुम्हार का वेश धारण कर उनके घर नौकरी करने आए। उनके बनाए बर्तन अद्भुत थे और गोराजी की आय बढ़ने लगी।
संत नामदेव जी को जब यह रहस्य ज्ञात हुआ, तब गोराजी को अपनी भूल का आभास हुआ। वे प्रभु के चरणों में क्षमा माँगने पहुँचे। भगवान ने उन्हें आदेश दिया—
“गृहस्थ धर्म का पालन करो।”
शिक्षा (Moral of the Story)
- सच्ची भक्ति में अहंकार नहीं होता।
- प्रभु अपने भक्त की हर परीक्षा स्वयं पार कराते हैं।
- गृहस्थ जीवन और भक्ति दोनों का संतुलन आवश्यक है।
जय जय श्री राधे 🙏
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