वेदों और धर्मशास्त्रों के अनुसार: पुत्र केवल एक नहीं, 12 प्रकार के होते हैं

कर्म के आधार पर बताए गए पुत्रों के प्रकार
शास्त्रों के अनुसार कुछ पुत्र पूर्वजन्म के कर्मों के परिणामस्वरूप माता-पिता के जीवन में आते हैं, जिनका स्वभाव और भूमिका अलग-अलग हो सकती है।


हिन्दू धर्म में ‘पुत्र’ शब्द का अर्थ केवल पारिवारिक संबंध नहीं, बल्कि एक गहरी धार्मिक और सामाजिक जिम्मेदारी माना गया है।

पुत्र शब्द का शास्त्रीय अर्थ

धर्मग्रंथों में पुत्र की व्युत्पत्ति इस प्रकार बताई गई है:

“पुन्नाम्नो नरकाद् यस्मात् त्रायते पितरं सुतः”

अर्थात जो पुत्र अपने पिता को ‘पुत्’ नामक नरक से बचाता है, वही सच्चा पुत्र कहलाता है। इसी कारण पिंडदान और श्राद्ध को हिन्दू धर्म में विशेष महत्व दिया गया है।

मनुस्मृति और धर्मशास्त्रों में वर्णित 12 प्रकार के पुत्र

धर्मशास्त्रों के अनुसार पुत्रों को उनके अधिकारों और कर्तव्यों के आधार पर बारह श्रेणियों में विभाजित किया गया है।

पिंडदान, गोत्र और प्रतिष्ठा के अधिकारी पुत्र

  • औरस – धर्मपत्नी से उत्पन्न संतान
  • क्षेत्रज – विशेष परिस्थितियों में उत्पन्न पुत्र
  • दत्तक – विधिपूर्वक गोद लिया गया पुत्र
  • कृत्रिम – स्वेच्छा से स्वीकार किया गया पुत्र
  • गूढ़ज – पिता अज्ञात, पर घर में जन्मा पुत्र
  • अपविद्ध – माता-पिता द्वारा त्यागा गया पुत्र

केवल नामधारी पुत्र

  • कानीन
  • सहोढ़
  • क्रीतक
  • पौनर्भव
  • स्वयंदत्त
  • शौद्र / पार्शव

कर्म आधारित विशेष प्रकार के पुत्र

शास्त्रों में यह भी उल्लेख मिलता है कि कुछ पुत्र पूर्वजन्म के कर्मों के अनुसार माता-पिता के जीवन में आते हैं।

  1. ऋणानुबंध पुत्र – पूर्व जन्म के ऋण से जुड़ा
  2. शत्रु पुत्र – पूर्व जन्म के शत्रु के रूप में
  3. उदासीन पुत्र – माता-पिता से दूरी रखने वाला
  4. सेवक पुत्र – माता-पिता की सेवा करने वाला श्रेष्ठ पुत्र

यह लेख शैक्षिक और सांस्कृतिक जानकारी के उद्देश्य से लिखा गया है, न कि किसी प्रकार के विवाद या तुलना के लिए।

🙏 सनातन धर्म की जय 🙏