Looking Glass Self Theory (देखने का शीशा आत्म-सिद्धांत)

यह सिद्धांत Charles Horton Cooley द्वारा प्रस्तुत किया गया था। इस सिद्धांत के अनुसार, व्यक्ति का आत्म-बोध (Self-Concept) समाज में उसके अन्य लोगों के साथ बातचीत और उनके द्वारा उसके बारे में किए गए आकलन (perceptions) के आधार पर विकसित होता है। दूसरे शब्दों में, हम अपनी पहचान और आत्म-मूल्य को इस आधार पर समझते हैं कि दूसरे लोग हमारे बारे में क्या सोचते हैं।

Cooley ने यह सिद्धांत 1902 में अपनी पुस्तक "Human Nature and the Social Order" में पेश किया था। इस सिद्धांत के अनुसार, आत्म-बोध केवल व्यक्तिगत अनुभवों का परिणाम नहीं होता, बल्कि यह समाज के अन्य व्यक्तियों द्वारा की गई टिप्पणियों और प्रतिक्रियाओं के द्वारा भी आकार लेता है।

मुख्य बातें:

Cooley के Looking Glass Self Theory में तीन मुख्य पहलु होते हैं:

  1. हम दूसरे लोगों की आँखों में खुद को कैसे देखते हैं (How we imagine others see us)

    • हम सोचते हैं कि लोग हमें कैसे देखते हैं, हमारे बारे में उनकी राय क्या हो सकती है, और हम उनका क्या आकलन करते हैं। यह हमें अपनी सामाजिक पहचान बनाने में मदद करता है।
    • उदाहरण: अगर हम सोचते हैं कि लोग हमें समझदार और बुद्धिमान मानते हैं, तो हमें भी अपनी पहचान में यह महसूस होता है।
  2. हम दूसरे लोगों की प्रतिक्रियाओं को कैसे महसूस करते हैं (How we imagine others feel about us)

    • यह उस प्रतिक्रिया का हिस्सा है जो हम दूसरों से प्राप्त करते हैं। यह सकारात्मक या नकारात्मक दोनों हो सकती है, और इससे हमारा आत्म-सम्मान प्रभावित होता है।
    • उदाहरण: यदि हमें कोई सराहना करता है, तो हम खुश महसूस करते हैं और हमारी आत्म-छवि सकारात्मक होती है। अगर कोई हमारी आलोचना करता है, तो हम दुखी हो सकते हैं और आत्म-संदेह का अनुभव कर सकते हैं।
  3. हम अपनी स्वयं की प्रतिक्रिया के बारे में कैसे महसूस करते हैं (How we feel about the way others see us)

    • यह उस आकलन का हिस्सा है कि हम अपने आप को दूसरों के दृष्टिकोण से कैसे देखते हैं। हमारी आत्म-मूल्यता और आत्म-सम्मान इस पर निर्भर करते हैं कि हम दूसरों द्वारा अपने बारे में दिए गए आकलन से कितने सहमत होते हैं।
    • उदाहरण: अगर हमें लगता है कि दूसरे लोग हमें सकारात्मक रूप से देखते हैं, तो हम अपने बारे में अच्छा महसूस करते हैं, लेकिन अगर हमें लगता है कि लोग हमें नकारात्मक रूप से देखते हैं, तो हम खुद को नकारात्मक रूप से देख सकते हैं।

उदाहरण:

  1. विद्यालय में प्रदर्शन:
    • एक छात्र जो स्कूल में अच्छा प्रदर्शन करता है, उसे अपने सहपाठियों से सराहना मिलती है। वह सोचता है कि "मेरे सहपाठी मुझे समझदार मानते हैं," और इसी वजह से वह खुद को अधिक आत्मविश्वास से भरपूर महसूस करता है। यह अनुभव उसे एक सकारात्मक "self-image" (आत्म-चित्र) बनाने में मदद करता है।
  2. सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाएँ:
    • एक व्यक्ति जो सोशल मीडिया पर अपनी तस्वीर पोस्ट करता है, उसे लाइक्स और टिप्पणियाँ मिलती हैं। अगर उसे सकारात्मक टिप्पणियाँ मिलती हैं, तो वह सोचता है कि लोग उसे आकर्षक मानते हैं और इसका असर उसकी आत्ममूल्यता पर पड़ता है। अगर उसे नकारात्मक टिप्पणियाँ मिलती हैं, तो उसकी आत्म-छवि पर नकारात्मक असर हो सकता है।

सिद्धांत का महत्व:

  • समाज में व्यक्ति का विकास: यह सिद्धांत यह बताता है कि हमारी सामाजिक पहचान और आत्म-मूल्यता समाज में हमारे रिश्तों और प्रतिक्रियाओं के आधार पर बनती है। हम न केवल खुद को महसूस करते हैं, बल्कि दूसरों की नज़र में भी अपनी पहचान को समझते हैं।

  • सामाजिक शिक्षा: यह सिद्धांत यह भी बताता है कि हम सामाजिक स्थितियों में किस तरह से सीखते हैं, जैसे बच्चों को सामाजिक मान्यताएँ, आदतें और व्यवहार दूसरों की प्रतिक्रियाओं से सीखने को मिलती हैं।

  • आत्म-सम्मान और आत्म-मूल्यता: यह सिद्धांत इस बात पर भी प्रकाश डालता है कि हमारे आत्म-सम्मान और आत्म-मूल्यता का हमारे साथियों, परिवार और समाज द्वारा दी गई प्रतिक्रियाओं पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

निष्कर्ष:

Looking Glass Self Theory यह दर्शाता है कि हम अपनी पहचान और व्यक्तित्व को केवल अपने अंदर से नहीं समझते, बल्कि यह समाज के अन्य लोगों के विचारों, प्रतिक्रियाओं और आकलन पर भी निर्भर करता है। इस सिद्धांत के जरिए हम यह समझ सकते हैं कि समाज में हर व्यक्ति का आत्म-सम्मान और पहचान कैसे बनती है और वह समाज में अपने स्थान को कैसे देखता है।