मन की अशांति क्या है और इसका कारण क्या है?

मन की अशांति को दर्शाती छवि जिसमें एक व्यक्ति ध्यान मुद्रा में है और उसके चारों ओर चिंता, गुस्सा, समय का दबाव और मानसिक द्वंद्व के प्रतीक दिखाई दे रहे हैं।
जब मन “ऐसा होना चाहिए, ऐसा नहीं होना चाहिए” के आग्रह में फँसता है,
तभी अशांति जन्म लेती है —
और स्वीकार से ही शांति आती है।













1️⃣ मन की अशान्ति का मूल कारण

“ऐसा होना चाहिए, ऐसा नहीं होना चाहिए” — यही अशान्ति है।

मन तब अशान्त होता है जब वह:

• भविष्य को नियंत्रित करना चाहता है
• परिणाम पर अधिकार जमाता है
• प्रकृति / ईश्वर के प्रवाह से अलग खड़ा होकर आग्रह करता है

आग्रह = विरोध
विरोध = द्वन्द्व
द्वन्द्व = अशान्ति


2️⃣ आग्रह क्यों व्यर्थ है?

क्योंकि होने वाला होकर रहेगा और न होने वाला नहीं होगा।
यह कोई निराशावाद नहीं, बल्कि यथार्थबोध है।

रावण का उदाहरण बिल्कुल सटीक है:

• शक्ति थी
• बुद्धि थी
• उपाय थे

लेकिन प्रारब्ध और धर्म-प्रवाह के विरुद्ध आग्रह उसे बचा नहीं सका।

आग्रह से न लाभ होता है, न हानि रुकती है —
पर मन का विष अवश्य बढ़ता है।


3️⃣ गीता का कामना-त्याग क्या है?

कामना-त्याग का अर्थ इच्छाओं का दमन नहीं,
बल्कि इच्छाओं का एक में विलय है।

“जिसका ऐसा होना चाहिए, ऐसा नहीं होना चाहिए —
ऐसा आग्रह नहीं रहा, वही मुक्त है।”

यह मुक्ति बाहरी स्थिति बदलने से नहीं,
भीतरी स्वीकार से आती है।


4️⃣ चिन्ता का अमोघ औषध

“जो नहीं होना है, वह नहीं होगा।
जो होना है, वह होकर रहेगा।”

यह वाक्य अगर
बुद्धि में नहीं
बल्कि हृदय में बैठ जाए

तो चिन्ता स्वतः गिर जाती है,
क्योंकि चिन्ता का आधार ही मैं-कर्तृत्व है।


5️⃣ सत्संग का वास्तविक लाभ

सत्संग कोई सूचना नहीं देता,
वह दृष्टि बदल देता है

तत्त्वज्ञ पुरुष के —

• संग से
• वाणी से
• सान्निध्य से

मन का गलत पकड़ना छूटता है।
यही सबसे बड़ा लाभ है।


6️⃣ सांसारिक और पारमार्थिक उन्नति का अंतर

अत्यंत सूक्ष्म सत्य है:

सांसारिक उन्नति

• लगन
• उद्योग
• प्रारब्ध

इन तीनों पर निर्भर है।

पारमार्थिक उन्नति

केवल लगन (इच्छामात्र) से।

क्यों?

क्योंकि परमात्म-तत्त्व —

• न उत्पन्न होता है
• न नष्ट होता है
• न दूर है

वह पहले से है।

देरी क्यों लगती है?

क्योंकि इच्छा अनेक हैं।

परमात्मा की इच्छा के साथ —

मान
सुरक्षा
सुख
पहचान
सिद्धि

ये सब जुड़ी हैं।

जब इच्छा एक हो जाती है,
तो अनुभव तुरंत।


8️⃣ सबसे गहरा सूत्र

“भगवत्प्राप्ति के लिए असली दुःख हो जाए,
तो वह दुःख भगवान् सह नहीं कर सकते।”

यह वाक्य साधना का शिखर है।

यहाँ —

रोना नहीं
मांग नहीं
प्रदर्शन नहीं

बल्कि असहाय तड़प है —
जहाँ दूसरा कुछ चाहिए ही नहीं।


🔚 निष्कर्ष (एक पंक्ति में)

मन की अशान्ति आग्रह से है,
और शान्ति अनन्य स्वीकार से।